यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटर के नेतृत्व में किए गए एक नए अध्ययन ने हिमालय के छह क्षेत्रों (लद्दाख से भूटान तक) में पौधों की वनस्पति रेखा (vegetation line) के तेजी से ऊपर की ओर शिफ्ट होने का खुलासा किया है। 1999 से 2022 के बीच सभी क्षेत्रों में यह रेखा लगातार ऊपर बढ़ी। सबसे कम दर खुम्बू क्षेत्र (माउंट एवरेस्ट वाला) में 1.42 मीटर प्रति वर्ष रही, जबकि नेपाल के मंथांग क्षेत्र में यह 6.95 मीटर प्रति वर्ष तक पहुंच गई। अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल इकोग्राफी में प्रकाशित हुए हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार, हिमालय वैश्विक औसत से कहीं तेज गर्म हो रहा है। बढ़ता तापमान और घटती बर्फ की परतें मुख्य कारण हैं, जिससे पहले बर्फ से ढके क्षेत्रों में अब छोटे पौधे और झाड़ियां जड़ें जमा रही हैं। अध्ययन की प्रमुख लेखिका रुओलिन लेंग ने कहा, “अल्पाइन क्षेत्र कठोर वातावरण वाला है, जहां मुख्य रूप से छोटे पौधे और झाड़ियां होती हैं, लेकिन अब संतुलन बदल रहा है। तापमान वृद्धि के साथ बर्फ कम हो रही है और पानी-पोषक तत्वों की उपलब्धता बदल रही है।”
प्रोफेसर कैरेन एंडरसन ने चेतावनी दी कि ये छोटे पौधे भले ही कम ध्यान आकर्षित करें, लेकिन ये मिट्टी की नमी, बर्फ के जमाव और पानी के प्रवाह को प्रभावित करते हैं। इससे जलचक्र बिगड़ सकता है, जो हिमालय से निकलने वाली नदियों (गंगा, ब्रह्मपुत्र आदि) पर निर्भर करोड़ों लोगों के जल, कृषि और आजीविका को खतरे में डाल देगा। अध्ययन में सैटेलाइट इमेजरी (Landsat) और जलवायु डेटा का उपयोग कर “ग्रीनिंग” (हरियाली बढ़ना) और “ब्राउनिंग” के रुझानों का विश्लेषण किया गया। अधिकांश क्षेत्रों में हरियाली बढ़ रही है, हालांकि खुम्बू और भूटान के कुछ हिस्सों में गिरावट भी दर्ज हुई।
यह बदलाव केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं। बुग्याल (अल्पाइन घास के मैदान), दुर्लभ जड़ी-बूटियां और स्थानीय जैवविविधता गंभीर खतरे में हैं। यदि वृक्ष रेखा ऊपर चढ़ती रही, तो बुग्याल सिकुड़ सकते हैं, जिससे मवेशी चरागाह और अनोखे इकोसिस्टम नष्ट हो सकते हैं। ICIMOD की रिपोर्ट्स भी पूर्वी हिमालय में सर्दियों-वसंत में तापमान वृद्धि और वृक्ष रेखा के ऊपर शिफ्ट होने की पुष्टि करती हैं।
यह “ऊपर चढ़ती हरियाली” प्रकृति का सामान्य विस्तार नहीं, बल्कि जलवायु संकट की जीवंत चेतावनी है। अगर यही रुझान जारी रहा, तो हिमालय का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र, जैवविविधता और जल संसाधन हमेशा के लिए बदल सकते हैं। तत्काल वैश्विक कार्रवाई और स्थानीय अनुकूलन जरूरी है।
