environmentalstory

Home » भागीरथी देवी: जंगल की संरक्षक ‘वन अम्मा’ की प्रेरणादायक कहानी

भागीरथी देवी: जंगल की संरक्षक ‘वन अम्मा’ की प्रेरणादायक कहानी

by kishanchaubey
0 comment

उत्तराखंड के चंपावत जिले के मानर गांव की रहने वाली भागीरथी देवी पिछले 20 वर्षों से अपनी दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं लाई हैं। हर दिन सुबह उठते ही वह जंगल की चौकीदारी करने निकल पड़ती हैं और दोपहर में घर लौटती हैं। दोपहर के बाद वह फिर से जंगल का दौरा करती हैं, और कई बार रात में भी जंगल की सुरक्षा के लिए अकेले निकल जाती हैं। अगर कोई जंगल को नुकसान पहुंचाता है तो वह उसे रोकने और खदेड़ने में बिल्कुल भी संकोच नहीं करतीं।

जंगल की सुरक्षा के लिए 25 साल की मेहनत

भागीरथी देवी पिछले 25 वर्षों से जंगल की सुरक्षा में जुटी हुई हैं। उन्होंने कई बार रात के अंधेरे में अवैध कटान रोकने के लिए छापेमारी की और दोषियों पर जुर्माना भी लगाया। जब भी वह अपने गांव से बाहर जाती हैं, तो जंगल की देखभाल की जिम्मेदारी अपने बेटे और बहू को सौंपती हैं। उनकी निःस्वार्थ सेवा और समर्पण को देखते हुए गांव के लोग उन्हें “वन अम्मा” कहकर पुकारने लगे हैं।

कैसे उजड़ गया था जंगल?

मानर गांव, जो समुद्र तल से 6,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, लगभग 100 परिवारों और 700 की आबादी वाला एक छोटा सा गांव है। साल 2000 तक यहां का 11.6 हेक्टेयर जंगल पूरी तरह बंजर हो चुका था। अत्यधिक पेड़ कटाई और अंधाधुंध चराई के कारण जंगल खत्म हो गया, जिससे ग्रामीणों को चारा, पानी और लकड़ी जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़ा।

महिलाओं पर सबसे ज्यादा पड़ा असर

जंगल खत्म होने का सबसे बुरा असर गांव की महिलाओं पर पड़ा। चारा, लकड़ी और सूखी पत्तियां लाने की जिम्मेदारी महिलाओं की होती थी, लेकिन जंगल खत्म होने के बाद उन्हें 7-8 किलोमीटर दूर सिद्ध मंदिर के जंगल जाना पड़ता था। इस काम में उनका आधा दिन लग जाता था, जिससे वे खेती और बच्चों की देखभाल पर ध्यान नहीं दे पाती थीं।

banner

वन पंचायत का गठन: जंगल को बचाने की नई शुरुआत

इस विकट स्थिति को देखते हुए भागीरथी देवी ने ग्रामीण महिलाओं को संगठित किया और जंगल को पुनर्जीवित करने का निर्णय लिया। साल 2000 में उन्होंने गांव की महिलाओं के सहयोग से वन पंचायत का गठन किया।

क्या होती है वन पंचायत?

उत्तराखंड में वन पंचायत की अवधारणा ब्रिटिश शासनकाल से चली आ रही है। 1921 में जब ब्रिटिश सरकार ने स्थानीय लोगों के वन उत्पादों पर नियंत्रण बढ़ा दिया, तो कुमाऊं और गढ़वाल में विरोध प्रदर्शन हुए। इस विरोध के चलते 1931 में वन पंचायतों का गठन किया गया, जिससे स्थानीय लोगों को जंगलों के प्रबंधन का अधिकार मिला।

वर्तमान में उत्तराखंड में 12,064 वन पंचायतें कार्यरत हैं, जो राज्य के 5,23,289 हेक्टेयर वन क्षेत्र का प्रबंधन करती हैं। यह राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 14% हिस्सा है। वन पंचायतों का मुख्य उद्देश्य वनों का संरक्षण और विकास करना तथा वन उत्पादों का उचित वितरण सुनिश्चित करना है।

भागीरथी देवी बनीं वन पंचायत की सरपंच

जब मानर गांव में वन पंचायत बनी, तो कोई भी इसकी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं था। ऐसे में भागीरथी देवी ने आगे बढ़कर यह जिम्मेदारी ली और सर्वसम्मति से वन पंचायत की सरपंच चुनी गईं। 2024 तक वह इस पद पर बनी रहीं।

कैसे फिर से हरा-भरा हुआ जंगल?

भागीरथी देवी और ग्रामीणों ने जंगल को पुनर्जीवित करने के लिए सख्त नियम बनाए। जंगल में अवैध कटान और चराई पर रोक लगा दी गई। नियमित गश्त शुरू की गई और जरूरत के हिसाब से वृक्षारोपण किया गया।

जंगल पुनर्जीवन के सकारात्मक परिणाम

  • पानी की उपलब्धता बढ़ी: जल स्रोत फिर से भरने लगे, जिससे गांव को पीने और सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिलने लगा।
  • चारा और लकड़ी की समस्या हल हुई: महिलाओं को अब दूर जंगल जाने की जरूरत नहीं पड़ती।
  • जैव विविधता में वृद्धि: वन्यजीवों की संख्या बढ़ी और पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत हुआ।
  • गांव की अर्थव्यवस्था में सुधार: जंगल से मिलने वाले प्राकृतिक संसाधनों से ग्रामीणों की आय बढ़ी।

भागीरथी देवी का योगदान और प्रेरणा

भागीरथी देवी की मेहनत और समर्पण से मानर गांव का उजड़ा जंगल फिर से हरा-भरा हो गया। उनका यह प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा बना हुआ है। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि अगर संकल्प मजबूत हो तो कोई भी बदलाव लाया जा सकता है।

You may also like