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नौतपा: अंधविश्वास नहीं, सदियों पुराना लोक मौसम विज्ञान

by kishanchaubey
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“धरती जितनी तपेगी, मानसून उतना बरसेगा”

“तपै नवतपा नव दिन जोय, तौ पुन बरखा पूरन होय।”

भारतीय गांवों में सदियों से कही जाने वाली यह कहावत केवल लोक-विश्वास नहीं, बल्कि मौसम को समझने की पारंपरिक वैज्ञानिक समझ का हिस्सा है। हर साल मई के आखिरी दिनों में जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब शुरू होता है नौ दिनों का भीषण गर्मी वाला दौर, जिसे ‘नौतपा’ कहा जाता है। मान्यता है कि इन दिनों धरती जितनी ज्यादा तपेगी, मानसून उतना अच्छा होगा।

आखिर क्या है नौतपा?

हिंदू पंचांग के अनुसार जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब अगले नौ दिनों को नौतपा कहा जाता है। आमतौर पर यह समय 25 मई से 2 जून के बीच आता है। यही वह दौर होता है जब उत्तर और मध्य भारत में सबसे ज्यादा गर्मी पड़ती है और तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है।

ग्रामीण समाज में माना जाता है कि अगर नौतपा ठीक से “तपे”, यानी तेज गर्मी पड़े, तो अच्छी बारिश होती है। अगर इन दिनों बादल या बारिश हो जाए तो मानसून कमजोर पड़ सकता है।

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विज्ञान क्या कहता है?

आधुनिक मौसम विज्ञान भी मानता है कि मई के अंत में भारत के मैदानी इलाके बहुत ज्यादा गर्म हो जाते हैं। जब जमीन तेज धूप से तपती है तो उसके ऊपर की हवा गर्म होकर हल्की हो जाती है और ऊपर उठने लगती है। इससे जमीन के पास कम दबाव यानी “लो प्रेशर” बनता है।

यही कम दबाव हिंद महासागर से नमी भरी मानसूनी हवाओं को भारत की तरफ खींचता है। आसान भाषा में कहें तो:

  • धरती ज्यादा तपेगी,
  • हवा ज्यादा ऊपर उठेगी,
  • कम दबाव ज्यादा मजबूत बनेगा,
  • और मानसून की हवाएं तेजी से भारत आएंगी।

यही कारण है कि नौतपा को मानसून का प्राकृतिक संकेत माना जाता है।

नौतपा मई के अंत में ही क्यों आता है?

हालांकि सूर्य 21 जून को कर्क रेखा के ठीक ऊपर होता है, फिर भी सबसे ज्यादा असर मई के अंत में दिखता है। इसकी वजह है उस समय की बेहद सूखी हवा।

सूखी हवा जल्दी गर्म होती है और तेजी से ऊपर उठती है। जून के अंत तक हवा में नमी बढ़ने लगती है, जिससे वह भारी हो जाती है और ऊपर कम उठती है। इसलिए मई का आखिरी सप्ताह सबसे प्रभावी “तापीय निम्न दबाव” बनाता है।

इसी समय तिब्बत का पठार भी गर्म होना शुरू होता है और ऊपर बहने वाली तेज “जेट स्ट्रीम” उत्तर की तरफ खिसक जाती है। इससे मानसून के लिए रास्ता खुलने लगता है।

क्या रोहिणी नक्षत्र सच में गर्मी बढ़ाता है?

लोककथाओं में कहा जाता है कि सूर्य रोहिणी की “शीतलता” सोख लेता है, इसलिए धरती तपती है। लेकिन वैज्ञानिक रूप से रोहिणी नक्षत्र के तारे पृथ्वी से लगभग 65 प्रकाश-वर्ष दूर हैं, इसलिए उनका मौसम पर सीधा असर संभव नहीं है।

असल में “रोहिणी” का उपयोग हमारे पूर्वजों ने एक खगोलीय कैलेंडर की तरह किया था। यानी आसमान में सूर्य की स्थिति देखकर मौसम और ऋतु परिवर्तन का अनुमान लगाया जाता था।

खेती से भी जुड़ा है नौतपा

नौतपा केवल मौसम का संकेत नहीं, खेती-किसानी का भी हिस्सा है। इस समय किसान खेतों की गहरी जुताई करते हैं और खेत खाली छोड़ते हैं।

आधुनिक कृषि विज्ञान के अनुसार इससे कई फायदे होते हैं:

  • तेज धूप मिट्टी में छिपे कीट और फफूंद को खत्म करती है।
  • खरपतवार के बीज नष्ट होते हैं।
  • मिट्टी भुरभुरी बनती है।
  • पहली बारिश का पानी तेजी से जमीन में समा जाता है।
  • मिट्टी की उर्वरता बेहतर होती है।

इसे आज की भाषा में “सॉइल सोलराइजेशन” कहा जाता है।

क्या नौतपा से मानसून की पूरी भविष्यवाणी हो सकती है?

वैज्ञानिक मानते हैं कि नौतपा मानसून के लिए जरूरी परिस्थितियां जरूर बनाता है, लेकिन सिर्फ उसी से पूरे मानसून का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

आज मानसून पर कई वैश्विक कारकों का असर पड़ता है, जैसे:

  • एल नीनो
  • ला नीना
  • हिंद महासागर द्विध्रुव

इसलिए नौतपा मानसून का एक महत्वपूर्ण संकेतक तो है, लेकिन अकेला कारण नहीं।

अंधविश्वास या लोक विज्ञान?

नौतपा को लेकर समाज में दो तरह की सोच दिखाई देती है।

एक वर्ग इसे अंधविश्वास कहकर पूरी तरह खारिज कर देता है। दूसरा वर्ग इसे चमत्कारिक या अलौकिक मान लेता है। जबकि सच इन दोनों के बीच है।

नौतपा दरअसल पीढ़ियों के अनुभव, प्रकृति के अवलोकन और मौसम की समझ पर आधारित “लोक मौसम विज्ञान” का उदाहरण है। आधुनिक विज्ञान इसके पीछे के कई सिद्धांतों को सही मानता है।

लोक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान साथ-साथ

भारत में आधुनिक उपकरण आने से बहुत पहले किसान और ग्रामीण समाज आसमान, हवा, मिट्टी और ऋतुओं को देखकर मौसम समझते थे। यही अनुभव लोक परंपराओं और कहावतों के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा।

आज दुनिया में इसे “एथ्नो-मेटियोरोलॉजी” यानी लोक मौसम विज्ञान कहा जाता है।

नौतपा इसी बात का उदाहरण है कि पारंपरिक ज्ञान को बिना समझे अंधविश्वास कह देना भी गलत है और उसे बिना वैज्ञानिक जांच के चमत्कार मान लेना भी गलत है।

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