एशिया के ऊंचे पहाड़ों, जिन्हें “हाई माउंटेन एशिया” या “एशिया की जल टंकियां” कहा जाता है, में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। नासा के ग्रेस मिशन के उपग्रह डेटा और जलवायु आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि 2002-03 से 2022-23 के बीच यहां हर साल औसतन 13.9 ± 3.6 गीगाटन (लगभग 1,390 करोड़ टन) बर्फ का द्रव्यमान कम हो रहा है। पिछले 20 वर्षों में कुल मिलाकर 27,800 करोड़ टन से ज्यादा बर्फ गायब हो चुकी है।
यह क्षेत्र हिमालय, तिब्बती पठार, काराकोरम, हिंदू कुश, पामीर और तियान शान जैसी पर्वत श्रृंखलाओं से बना है, जो करीब 50 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यहां 95,000 से अधिक ग्लेशियर हैं, जो सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र, यांग्त्जे और मेकोंग जैसी प्रमुख नदियों को पानी देते हैं।
करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा, कृषि, जलविद्युत और अर्थव्यवस्था इन पर निर्भर है। ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता जयदेव धारपुरे (Jaydeo K. Dharpure) के नेतृत्व में किए गए अध्ययन में मशीन लर्निंग और गुरुत्वाकर्षण डेटा का उपयोग कर यह निष्कर्ष निकाला गया है।
सभी क्षेत्रों में स्थिति एक समान नहीं है। पूर्वी कुनलुन में हर साल करीब 1.1 ± 0.2 गीगाटन बर्फ बढ़ने के संकेत हैं, जबकि पश्चिमी तियान शान सबसे ज्यादा प्रभावित है, जहां सालाना 1.9 ± 0.4 गीगाटन बर्फ पिघल रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ता वैश्विक तापमान, बारिश के पैटर्न में बदलाव और सौर विकिरण इसके मुख्य कारण हैं।
भविष्य और भी चिंताजनक है। अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन तेजी से बढ़ता रहा (SSP585 परिदृश्य), तो पिघलने की रफ्तार बढ़कर 19.5 ± 11.3 गीगाटन प्रति वर्ष तक पहुंच सकती है। वहीं, अगर उत्सर्जन पर काबू पाया गया (SSP126), तो यह दर काफी कम होकर 2.3 ± 0.3 गीगाटन रह सकती है।
पिघलते ग्लेशियर दोहरा खतरा पैदा कर रहे हैं—एक ओर नई अस्थिर ग्लेशियल झीलों के कारण अचानक ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी आपदाएं बढ़ रही हैं, दूसरी ओर लंबे समय में पानी की भारी कमी हो सकती है। इससे बुनियादी ढांचे, कृषि और जान-माल को खतरा है।
यह अध्ययन फरवरी 2026 में प्रतिष्ठित जर्नल Scientific Reports में प्रकाशित हुआ। वैज्ञानिक चेताते हैं कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर तत्काल नियंत्रण न किया गया तो एशिया की ये जीवनरेखाएं सूखती उम्मीदों का प्रतीक बन सकती हैं।
