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ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम: बिहार में अमृत बन रहा जहर, शिशु स्वास्थ्य पर खतरा

by kishanchaubey
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मां का दूध शिशुओं के लिए सबसे उत्तम पोषण माना जाता है, लेकिन बिहार के कई जिलों में इसमें रेडियोधर्मी यूरेनियम-238 पाए जाने से चिंता बढ़ गई है। नेचर जर्नल में प्रकाशित अध्ययन “डिस्कवरी ऑफ यूरेनियम कंटेंट इन ब्रेस्टमिल्क…” के अनुसार, भोजपुर, समस्तीपुर, बेगूसराय, खगड़िया, कटिहार और नालंदा जिलों की 40 माताओं के दूध के नमूनों में यूरेनियम की मात्रा शून्य से 6 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक पाई गई।

सबसे अधिक 5.25 μg/L कटिहार में दर्ज की गई।महावीर कैंसर संस्थान, पटना की डॉ. मनीषा सिंह और शोधकर्ता डॉ. अरुण कुमार ने बताया कि यह प्रदूषण मुख्यतः पीने के पानी और भोजन से आ रहा है।

अध्ययन में मोंटे कार्लो सिमुलेशन से पता चला कि 70% शिशुओं में गैर-कैंसरजन्य स्वास्थ्य प्रभावों का जोखिम है, हालांकि कैंसर का खतरा नहीं पाया गया। यूरेनियम किडनी, हड्डियों में जमा होकर दीर्घकालिक नुकसान पहुंचा सकता है।

यह समस्या केवल बिहार तक सीमित नहीं। “एक्सपोसोम ऑफ ह्यूमन मिल्क एक्रॉस इंडिया” डेटाबेस के अनुसार, 13 राज्यों में ब्रेस्टमिल्क में 100 से अधिक प्रदूषक मिले हैं—आर्सेनिक, लेड, मर्करी, डीडीटी, पीसीबी, डायऑक्सिन आदि।

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पंजाब, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल में स्तर चिंताजनक हैं। फॉस्फेट उर्वरकों, औद्योगिक प्रदूषण, गहरी बोरिंग और पुराने कीटनाशकों के अवशेष इनके प्रमुख स्रोत हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रेस्टमिल्क अभी भी शिशुओं के लिए सर्वोत्तम है।

डब्ल्यूएचओ और डॉक्टर सलाह देते हैं कि कीमोथेरेपी वाली माताओं को छोड़कर अन्य सभी स्तनपान जारी रखें। समाधान के लिए भूजल निगरानी, उर्वरक नियंत्रण, कीटनाशक प्रतिबंध और देशव्यापी जांच जरूरी है।पर्यावरण प्रदूषण अब नवजात शिशुओं तक पहुंच रहा है। स्वस्थ भविष्य के लिए जल, मिट्टी और हवा को शुद्ध करने की तत्काल जरूरत है।

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