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कश्मीर में ओलावृष्टि: मिनटों में सेब की फसल तबाह, किसान परेशान

by kishanchaubey
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Kashmiri Apple: कश्मीर के श्रीनगर से करीब 80 किलोमीटर दूर एक गांव में एक सेब उत्पादक अपने बाग के बीच खड़े हैं। पिछले सप्ताह हुई ओलावृष्टि ने उनके आठ कनाल बाग के 80-85 प्रतिशत हिस्से को बर्बाद कर दिया। आधे घंटे से भी कम समय चले तूफान ने पेड़ों पर लगे नाजुक लाल फूलों को जमीन पर बिखेर दिया, जो फल बनने के लिए बेहद जरूरी हैं।

यह नुकसान सिर्फ एक बाग तक सीमित नहीं है। ओलावृष्टि ने शोपियां, कुलगाम और बांदीपोरा के कई प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्रों को प्रभावित किया। फूल आने के सबसे संवेदनशील समय पर हुई इस घटना से किसानों की उबरने की संभावना बहुत कम रह गई है। छोटे-छोटे ओले भी फूल गिरा देते हैं और नवजात फलों को नुकसान पहुंचाते हैं, जिसका असर उसी मौसम में पूरा नहीं किया जा सकता।

वैज्ञानिकों के अनुसार, कश्मीर में मौसम तेजी से बदल रहा है। कुल वर्षा घट रही है, तापमान बढ़ रहा है और घटनाएं अधिक अनियमित हो गई हैं। 2007 से 2022 के बीच घाटी में 200 से ज्यादा ओलावृष्टि दर्ज की गईं, जो 2022 में 27 तक पहुंच गई। ये घटनाएं अब मुख्य रूप से अप्रैल-जून के बीच हो रही हैं — ठीक सेब के फूल आने के महत्वपूर्ण चरण में।

तापमान वृद्धि से वायुमंडलीय अस्थिरता बढ़ रही है, जिससे तेज ऊर्ध्वाधर हवा के प्रवाह बन रहे हैं और ओले गिरने की स्थिति तैयार हो रही है। कश्मीर की भौगोलिक स्थिति इस खतरे को और बढ़ा रही है।

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बार-बार होने वाली ओलावृष्टि से किसानों की आय और भरोसा दोनों कमजोर हो रहे हैं। कई परिवार कर्ज में डूब रहे हैं। एक मौसम की तबाही शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की जरूरतों को भी प्रभावित कर देती है। अध्ययनों के मुताबिक, नुकसान 30 से 70 प्रतिशत तक हो सकता है और पेड़ों की सेहत कई सालों तक प्रभावित रहती है।

समाधान सीमित हैं। एंटी-हेल नेट बहुत महंगे होने से केवल 0.06 प्रतिशत बागवानों तक पहुंच पाए हैं। फसल बीमा की प्रभावशीलता भी कमजोर है।

विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि तुरंत एंटी-हेल नेट पर सब्सिडी, बेहतर मौसम पूर्व चेतावनी प्रणाली और कुछ घंटों पहले सूचना देना जरूरी है। दीर्घकालिक रूप से जलवायु-लचीली बागवानी तकनीक, मजबूत बीमा और स्थानीय मौसम पूर्वानुमान प्रणाली अपनानी चाहिए।

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