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पेट-दिमाग का गहरा कनेक्शन: माइक्रोबायोम कैसे तय करता है हमारा मानसिक स्वास्थ्य

by kishanchaubey
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आजकल की भागती-दौड़ती जिंदगी में हम खाना खाते हैं लेकिन यह नहीं सोचते कि वह हमारे पेट तक पहुंचकर क्या करता है। अगर पॉडकास्ट शुरू होने से पहले आपने खाना खाया है तो उसके खत्म होने तक वह शायद पेट तक भी नहीं पहुंचा होगा। फिर वह पाचन की पूरी प्रक्रिया से गुजरकर पोषण बनेगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पेट सिर्फ खाना पचाने का काम नहीं करता? वह हमारे दिमाग को भी सीधे प्रभावित करता है।

पेट एसिड की मदद से भोजन को पचाता है, छोटी आंत में पोषक तत्वों को सोखता है और बची हुई चीजों को बड़ी आंत में भेजता है। यह सिर्फ पाचन ही नहीं, बल्कि शरीर का सबसे शक्तिशाली इम्यून सिस्टम भी है। पेट की दीवार बैक्टीरिया और वायरस को शरीर के बाकी हिस्सों में जाने से रोकती है। अगर यह दीवार कमजोर हुई तो सूजन, क्रोहन डिजीज और अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसी बीमारियां हो सकती हैं।

सबसे रोचक बात यह है कि पेट और दिमाग के बीच “वेगस नर्व” नाम की सबसे लंबी नस है जो दोनों के बीच सिग्नल का सुपर हाईवे है। 10 साल पहले कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक प्रयोग किया। कुछ महिलाओं को प्रोबायोटिक युक्त फर्मेंटेड दूध पिलाया गया। चार हफ्ते बाद उनके दिमाग की संवेदी गतिविधि में साफ बदलाव आया। इससे साबित हुआ कि पेट के माइक्रोबायोम (अच्छे बैक्टीरिया) दिमाग की गतिविधि को नियंत्रित करते हैं।

अब शोध बताते हैं कि डिप्रेशन और एंग्जायटी से जूझ रहे लोगों में कुछ खास बैक्टीरिया की कमी होती है। ये बैक्टीरिया न सिर्फ खाने से आते हैं बल्कि हमारे डीएनए से भी जुड़े होते हैं। प्रोबायोटिक और प्रीबायोटिक सप्लीमेंट्स इनकी संख्या बढ़ा सकते हैं, लेकिन सबसे अच्छा तरीका है प्राकृतिक आहार—ताजा फल, सब्जियां, फाइबर और फर्मेंटेड फूड जैसे दही।

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हम दो लोगों को खाना खिलाते हैं—एक अपना शरीर (प्रोटीन-कार्बोहाइड्रेट) और दूसरा पेट के माइक्रोब्स (फाइबर)। मोटापा, डायबिटीज और कई बीमारियां तब शुरू होती हैं जब पेट के माइक्रोबायोम की विविधता कम हो जाती है। इसलिए अगली बार जब “गट फीलिंग” कहे तो ध्यान दें। क्योंकि सारा स्वास्थ्य पेट से शुरू होता है।

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