आज 4 दिसंबर को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय चीता दिवस मनाया जा रहा है। चीता संरक्षण कोष (CCF) ने 2010 में इसकी शुरुआत की थी ताकि दुनिया के सबसे तेज धावक चीता (Acinonyx jubatus) की घटती आबादी और सिकुड़ते आवास के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाई जा सके।
वर्तमान में जंगली चीतों की संख्या महज 7,100 के करीब रह गई है और ये अपने ऐतिहासिक क्षेत्र के 91 प्रतिशत हिस्से से विलुप्त हो चुके हैं। IUCN रेड लिस्ट में चीता “संकटग्रस्त” श्रेणी में है। पिछले 15 वर्षों में इसकी आबादी में 37 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है। मुख्य खतरे हैं – आवास विनाश, मानव-वन्यजीव संघर्ष और शिकार की कमी।
इस साल मार्च में दक्षिण अफ्रीका के प्रसिद्ध चीता संरक्षणवादी विन्सेंट वैन डेर मेरवे का निधन हो गया। उनकी स्थापित चीता मेटापॉपुलेशन पहल ने छोटे-छोटे रिजर्व में बंटी आबादी में इनब्रीडिंग रोकने के लिए चीतों का नियोजित स्थानांतरण किया। नतीजा यह हुआ कि दक्षिण अफ्रीका आज दुनिया का एकमात्र देश है जहां जंगली चीतों की संख्या बढ़ रही है।
भारत की प्रोजेक्ट चीता ने भी ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। 1952 में देश से विलुप्त हो चुके चीते की 70 साल बाद वापसी हुई। नामीबिया व दक्षिण अफ्रीका से लाए गए 20 संस्थापक चीतों से शुरू हुई यह परियोजना दिसंबर 2025 तक 32 चीतों तक पहुंच चुकी है, जिनमें 21 शावक भारत में ही जन्मे हैं। नवंबर 2025 में कूनो की मादा चीता ‘मुखी’ ने एक साथ पांच स्वस्थ शावकों को जन्म दिया, जो परियोजना की दीर्घकालिक सफलता का मजबूत संकेत है।
अंतरराष्ट्रीय चीता दिवस हमें याद दिलाता है कि चीते को बचाने के लिए सुरक्षित व जुड़े आवास, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और वैज्ञानिक प्रबंधन जरूरी है। यह तेज धावक हमारी साझा प्राकृतिक धरोहर है – इसे बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।
