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पंजाब में बाढ़ का कहर: 4 लाख प्रभावित, 48 की मौत, गुरदासपुर सबसे अधिक प्रभावित

by kishanchaubey
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पंजाब में 30 अगस्त तक सामान्य से 24% अधिक वर्षा (443 मिमी बनाम 357.1 मिमी) दर्ज की गई। 28 अगस्त से 3 सितंबर तक भारत में सामान्य से 48% अधिक बारिश (75.2 मिमी) हुई।

हिमाचल प्रदेश में बादल फटने से सतलुज, ब्यास और रावी नदियों में अचानक जलस्तर बढ़ा, जिसके कारण भाखड़ा, पोंग और रणजीत सागर बांधों से अत्यधिक पानी छोड़ा गया। मॉनसून ट्रफ, पश्चिमी विक्षोभ और चक्रवाती तंत्र ने भारी वर्षा को और बढ़ावा दिया।

मानव-निर्मित कारण: सतलुज, ब्यास और रावी नदियों के किनारे धुस्सी बांधों का टूटना प्रमुख कारण रहा। इन बांधों का मॉनसून से पहले रखरखाव और मजबूतीकरण नहीं किया गया। नदियों के बाढ़ मैदानों पर अवैध अतिक्रमण, खेती और बस्तियों ने नुकसान को बढ़ाया।

रूपनगर जिले में सतलुज के ‘बेला बेल्ट’ पर 50,000 लोग और गुरदासपुर में ब्यास-रावी के किनारे 450 गांव बसे हैं। गाद जमाव (सिल्टेशन) के कारण नदियों और बांधों की जलधारण क्षमता घटी, और समय पर डीसिल्टिंग न होने से स्थिति बिगड़ी।

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दक्षिण-पश्चिमी जिलों में जाम नहरों और ड्रेनों ने बाढ़ को और गंभीर किया। शहरी क्षेत्रों में खराब सीवरेज और ड्रेनेज सिस्टम के कारण मोहाली, लुधियाना, जालंधर, अमृतसर और चंडीगढ़ में शहरी फ्लैश फ्लड की स्थिति बनी।

नुकसान का दायरा: बाढ़ ने 1.76 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि, विशेषकर धान की फसल को नष्ट किया। गुरदासपुर, अमृतसर, पठानकोट, होशियारपुर, कपूरथला, तरनतारन, फिरोजपुर, फाजिल्का, जालंधर और रूपनगर के 1,400 से अधिक गांव प्रभावित हुए।

पटियाला में घग्गर नदी के किनारे जलभराव की सूचना मिली। शहरी क्षेत्रों में सड़कों, आवासीय और वाणिज्यिक परिसरों में जलभराव हुआ।

राहत और बचाव कार्य

स्थानीय ग्रामीणों, प्रशासन और गैर-सरकारी संगठनों ने राहत कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ग्रामीणों ने धुस्सी बांधों को मजबूत किया, लोगों को गुरुद्वारों, धर्मशालाओं और स्कूलों में बनाए गए आश्रयों में पहुंचाया, लंगर के माध्यम से भोजन वितरित किया और सोशल मीडिया व गुरुद्वारा लाउडस्पीकरों से चेतावनियां जारी कीं। पंजाबी गायक, अभिनेता और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों ने भी आर्थिक सहायता और राहत कार्यों में योगदान दिया।

भविष्य के लिए बाढ़ प्रबंधन के उपाय

पंजाब में बाढ़ के जोखिम को कम करने के लिए निम्नलिखित उपाय सुझाए गए हैं:

  1. बाढ़-मैदान जोनिंग: बाढ़-प्रवण क्षेत्रों में अतिक्रमण, खेती और बस्तियों पर सख्त रोक।
  2. विभागीय समन्वय: मौसम विभाग, सिंचाई विभाग और भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड के बीच बेहतर समन्वय।
  3. भौतिक उपाय: मॉनसून से पहले तटबंधों का निर्माण, रखरखाव और नदियों-बांधों की डीसिल्टिंग।
  4. शहरी ढांचा सुधार: पुराने सीवरेज और ड्रेनेज सिस्टम का उन्नयन, वर्षा जल निकासी नालों का पुनर्जनन।
  5. वित्तीय आवंटन: नहरों और ड्रेनों की सफाई के लिए पर्याप्त धन।
  6. क्षतिपूर्ति: बाढ़ प्रभावितों को समय पर मुआवजा।
  7. समुदाय भागीदारी: स्थानीय लोगों और एनजीओ को राहत कार्यों में शामिल करना।
  8. प्रशासनिक मजबूती: जिला आपदा प्रतिक्रिया केंद्रों को सशक्त करना।

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