इंसानी महत्वाकांक्षा के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं, लेकिन हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन ने इस खतरे की गंभीरता को और स्पष्ट कर दिया है। जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स नामक अंतरराष्ट्रीय जर्नल में छपे एक नए शोध के अनुसार, पिछले 200 वर्षों में इंसानों द्वारा बनाए गए हजारों बांधों ने पृथ्वी की धुरी को लगभग एक मीटर (3.7 फीट) तक खिसका दिया है।
इस बदलाव ने न केवल ग्रह के संतुलन को प्रभावित किया है, बल्कि वैश्विक समुद्र स्तर को भी 21 मिलीमीटर तक कम कर दिया है।पृथ्वी की सतह पर होने वाली गतिविधियां, जैसे बांधों में पानी का भंडारण, बर्फ का पिघलना, या टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल, ग्रह के द्रव्यमान वितरण को प्रभावित करती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी की सबसे ऊपरी ठोस परत (क्रस्ट) नीचे मौजूद पिघली हुई चट्टानों (मैग्मा) पर तैरती है।
जब सतह पर भारी मात्रा में द्रव्यमान, जैसे बांधों में जमा पानी, एकत्र होता है, तो यह संतुलन बिगड़ जाता है। इसकी वजह से पृथ्वी की धुरी हिलती है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘ट्रू पोलर वॉन्डर’ कहा जाता है।अध्ययन के अनुसार, 1835 से 2011 के बीच दुनिया भर में 6,862 बड़े बांध बनाए गए, जिनमें जमा पानी ने पृथ्वी के ध्रुवों को 113 सेंटीमीटर तक खिसका दिया।
इस दौरान दो प्रमुख चरण देखे गए। पहले चरण (1835-1954) में, जब ज्यादातर बांध अमेरिका और यूरोप में बने, उत्तरी ध्रुव रूस और एशिया की ओर 20.5 सेंटीमीटर खिसका। दूसरे चरण (1954 के बाद) में, एशिया और पूर्वी अफ्रीका में बांधों के निर्माण के कारण ध्रुव 57 सेंटीमीटर तक पश्चिमी अमेरिका और दक्षिणी प्रशांत की ओर खिसक गया।
इसके अलावा, बांधों में पानी के भंडारण ने समुद्र के स्तर को भी प्रभावित किया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि 1900 से 2011 के बीच बांधों की वजह से समुद्र का स्तर 0.86 इंच (21 मिलीमीटर) तक गिरा। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रमुख शोधकर्ता नताशा वलेनसिक ने बताया, “बांधों में पानी रोकने से न केवल समुद्र का स्तर कम होता है, बल्कि पृथ्वी के द्रव्यमान का संतुलन भी बिगड़ता है, जिससे ध्रुव अपनी जगह से हट जाते हैं।”
वैज्ञानिकों ने पाया कि इस बदलाव का सबसे बड़ा कारण 6,000 सबसे बड़े बांध हैं, जबकि छोटे बांधों का प्रभाव नगण्य रहा। यह अध्ययन इस बात का प्रमाण है कि इंसानी गतिविधियां न केवल पर्यावरण, बल्कि पृथ्वी की भौगोलिक संरचना को भी बदल रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही यह बदलाव छोटा प्रतीत हो, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम गंभीर हो सकते हैं, खासकर जलवायु परिवर्तन और समुद्र स्तर की भविष्यवाणियों के संदर्भ में।यह खबर हमें एक बार फिर सोचने पर मजबूर करती है कि हमारी गतिविधियां ग्रह के प्राकृतिक संतुलन को किस हद तक प्रभावित कर रही हैं और भविष्य में इसके क्या परिणाम हो सकते हैं।
