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चंद्रपुर में टाइगर कॉरिडोर के भीतर कोयला खनन को मंजूरी, एनबीडब्ल्यूएल ने लगाई शर्तें

by kishanchaubey
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चंद्रपुर, 14 जुलाई 2025: महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में ताडोबा अंधारी टाइगर रिजर्व, कन्हरगांव वन्यजीव अभयारण्य, और टिपेश्वर वन्यजीव अभयारण्य को जोड़ने वाले टाइगर कॉरिडोर के भीतर 80.77 हेक्टेयर वन भूमि पर कोयला खनन को मंजूरी दे दी गई है।

नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ (एनबीडब्ल्यूएल) की स्थायी समिति ने 26 जून 2025 को अपनी 84वीं बैठक में वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड की दुर्गापुर ओपनकास्ट माइन परियोजना को कई शर्तों के साथ हरी झंडी दिखाई। यह क्षेत्र बाघों की आवाजाही और प्रवास के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रस्ताव और चर्चा का इतिहास: इस परियोजना पर पहली बार 12 मार्च 2025 को एनबीडब्ल्यूएल की 82वीं बैठक में चर्चा हुई थी। इसके बाद 7 मई 2025 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) के सचिव की अध्यक्षता में एक समीक्षा बैठक हुई, जिसमें परियोजना के पारिस्थितिक प्रभावों का आकलन किया गया।

नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत टाइगर कॉरिडोर की पहचान के लिए राज्य सरकार को सूचित करने और स्थल निरीक्षण का निर्देश दिया गया।

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एनटीसीए और महाराष्ट्र सरकार की भूमिका: एनटीसीए ने “लीस्ट-कॉस्ट पाथवेज” के आधार पर टाइगर कॉरिडोर की पहचान की, जबकि महाराष्ट्र सरकार ने अपने टाइगर कंजर्वेशन प्लान में टेलीमेट्री डेटा के आधार पर कॉरिडोर को प्राथमिकता दी। एनबीडब्ल्यूएल के सदस्य एचएस सिंह ने सुझाव दिया कि राज्य के मुख्य वन्यजीव वार्डन द्वारा प्रस्ताव की दोबारा समीक्षा की जाए।

वहीं, सदस्य रमण सुकुमार ने जोर दिया कि जमीनी स्तर पर जांच जरूरी है, क्योंकि डिजिटल टूल्स और स्थानीय जानकारी में अंतर हो सकता है। उन्होंने कहा, “डिजिटल टूल्स एक मार्ग दिखा सकते हैं, लेकिन स्थानीय लोगों से बातचीत और साक्ष्य अलग जानकारी दे सकते हैं।”

मंत्रालय का रुख: मंत्रालय के सचिव ने तर्क दिया कि चूंकि यह क्षेत्र “पहले से ही टूटा हुआ” है, इसलिए खनन परियोजना को मंजूरी दी जा सकती है। एनटीसीए को निर्देश दिया गया कि केवल उनके द्वारा पहचाने गए “लीस्ट-कॉस्ट पाथवेज” को ही टाइगर कॉरिडोर माना जाए।

मंजूरी की शर्तें: समिति ने 18.07 करोड़ रुपये की लागत से तैयार वन्यजीव प्रबंधन योजना को लागू करने की शर्त रखी, जो भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून के अध्ययन पर आधारित है।

अन्य शर्तों में शामिल हैं:

  • दुर्गापुर वन क्षेत्र की सीमाओं पर बाड़ लगाना, ताकि वन्यजीवों की आवाजाही सीमित हो।
  • प्रोसोपिस जैसे आक्रामक पौधों को पांच वर्षों में हटाने की योजना, जिसे चंद्रपुर के मुख्य वन संरक्षक की सलाह से तैयार और अनुमोदित किया जाएगा।

चिंताएं और प्रभाव: यह कॉरिडोर बाघों के प्रवास के लिए महत्वपूर्ण है, और खनन गतिविधियां वन्यजीवों के आवास को प्रभावित कर सकती हैं। विशेषज्ञों ने चिंता जताई कि खनन से बाघों की आवाजाही बाधित हो सकती है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ सकता है। फिर भी, मंत्रालय और एनबीडब्ल्यूएल का मानना है कि शर्तों के साथ परियोजना को आगे बढ़ाया जा सकता है।

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