दुनिया भर में अरबों लोगों की समुद्री आहार की जरूरतों को पूरा करने के लिए मछलियों पर निर्भरता बढ़ रही है, लेकिन मछली की कई प्रजातियां खतरे की कगार पर हैं। नेचर सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित एक नए शोध के अनुसार, मछलियों की प्रजातियों की विविधता न केवल पोषण को 60 फीसदी तक बढ़ा सकती है, बल्कि मत्स्य पालन की स्थिरता को भी सुनिश्चित कर सकती है।
शोध में सामने आया है कि जैव विविधता मानवजनित दबावों जैसे अत्यधिक मछली पकड़ने और जलवायु परिवर्तन से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
शोधकर्ताओं ने मछलियों की लगभग 30,000 प्रजातियों में से खाद्य प्रजातियों की पहचान कर उनके पोषक तत्वों का विश्लेषण किया। इसके बाद, बायोग्राफिकल और पोषक तत्वों के आंकड़ों को कंप्यूटर मॉडल में डालकर यह निर्धारित किया गया कि कौन सी प्रजातियों का मिश्रण न्यूनतम बायोमास के साथ अधिकतम पोषण प्रदान कर सकता है।
मॉडल से पता चला कि जैव विविधता वाले मत्स्य पालन में छोटी प्रजातियां, जैसे सार्डिन, अधिक पौष्टिक और पारिस्थितिक रूप से लचीली होती हैं। ये प्रजातियां खाद्य श्रृंखला में नीचे होती हैं, तेजी से बढ़ती हैं, और व्यापक तापमान सहनशीलता के कारण जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूल होती हैं।
शोध में पाया गया कि उष्णकटिबंधीय तटीय क्षेत्रों, जैसे प्रशांत महासागर के फिलीपींस, सिंगापुर, सोलोमन द्वीप, ऑस्ट्रेलिया, भारत और अमेजन में मछलियों की जैव विविधता सबसे अधिक है। इसके विपरीत, अमेरिका में जैव विविधता अच्छी होने के बावजूद, लोग केवल 10 प्रजातियों पर निर्भर हैं, जो उनके समुद्री भोजन का 90 फीसदी हिस्सा बनाती हैं।
शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि उपभोक्ताओं को छोटी प्रजातियों की विविधता को अपने आहार में शामिल करना चाहिए। क्षेत्रीय स्तर पर, समुद्री संरक्षित क्षेत्रों और स्थानीय समुदायों द्वारा प्रबंधित मत्स्य पालन जैव विविधता को बढ़ाने में प्रभावी साबित हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह शोध जैव विविधता के महत्व को उजागर करता है, जो न केवल पर्यावरण संरक्षण के लिए, बल्कि मानव पोषण और मत्स्य पालन की स्थिरता के लिए भी जरूरी है।
यह शोध नीति निर्माताओं, मत्स्य पालकों और उपभोक्ताओं को टिकाऊ और पौष्टिक समुद्री आहार की दिशा में कदम उठाने के लिए प्रेरित कर सकता है।
