कर्नाटक सरकार ने उन क्षेत्रों की दोबारा जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाई है, जिन्हें गैर-अधिसूचित जंगल (पहले “डीम्ड फॉरेस्ट” के नाम से जाना जाता था) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इस समिति को अगले छह महीनों में अपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा वन (संरक्षण) अधिनियम में किए गए संशोधन को चुनौती देने वाली एक याचिका की सुनवाई के दौरान गैर-अधिसूचित जंगलों की पहचान की प्रक्रिया को तेज करने पर जोर दिया था।
वन (संरक्षण और संवर्धन) नियम, 2023 के नियम 16(1) के तहत, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को उन क्षेत्रों की पहचान करने के लिए विशेषज्ञ समितियां गठित करने का आदेश दिया गया है, जो जंगल जैसे दिखते हैं लेकिन आधिकारिक तौर पर जंगल के रूप में अधिसूचित नहीं हैं।
4 मार्च, 2025 को जारी एक आदेश में, सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को गैर-अधिसूचित जंगलों की पहचान छह महीने के भीतर पूरी करने और अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा, “केंद्र सरकार इन रिपोर्टों को एकत्र करेगी, राज्यवार स्थिति तैयार करेगी और इसे इस कोर्ट के सामने पेश करेगी।” इस मामले की अगली सुनवाई सितंबर में होगी।
वन विभाग की प्रतिक्रिया
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन बल प्रमुख) मीनाक्षी नेगी ने कहा कि वन विभाग इस मामले को गंभीरता से ले रहा है। उन्होंने बताया, “विशेषज्ञ समिति का गठन कर दिया गया है। हम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करेंगे और अपनी रिपोर्ट समय पर जमा करेंगे।”
कर्नाटक का तीसरा प्रयास
यह कर्नाटक का गैर-अधिसूचित जंगलों की पहचान और संरक्षण के लिए तीसरा प्रयास है। पहले गठित समिति की एक रिपोर्ट में इन जंगलों का क्षेत्रफल 9.94 लाख हेक्टेयर से घटकर 3.3 लाख हेक्टेयर हो गया था। मई 2022 में डीम्ड फॉरेस्ट को लेकर जारी अधिसूचना को अब नई विशेषज्ञ समिति के गठन के बाद रद्द कर दिया गया है।
क्या होगा बदलाव?
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि बड़े पैमाने पर डीम्ड फॉरेस्ट के क्षेत्रों को हटाए जाने की संभावना कम है। उन्होंने कहा, “पहले गठित समिति ने सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का पालन किया था, लेकिन उसकी रिपोर्ट में कुछ त्रुटियां थीं, जिसके कारण शिकायतें आईं। जनता या विभिन्न विभागों के दावों के कारण कुछ क्षेत्रों को हटाया जा सकता है। हालांकि, इसके बदले नए क्षेत्रों को जोड़ा जाएगा ताकि संतुलन बना रहे।”
क्यों जरूरी है यह कदम?
गैर-अधिसूचित जंगल वे क्षेत्र हैं जो प्राकृतिक रूप से जंगल जैसे हैं, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में इन्हें जंगल के रूप में दर्ज नहीं किया गया है। इनकी सही पहचान और संरक्षण से पर्यावरण की रक्षा, जैव विविधता को बढ़ावा और जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद मिलेगी। कर्नाटक में इन जंगलों का बड़ा हिस्सा पश्चिमी घाट जैसे जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्रों में है, जो पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं।
आगे की राह
नई विशेषज्ञ समिति को न केवल पुरानी गलतियों को सुधारना है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि जंगल जैसे क्षेत्रों का सही तरीके से चिह्नीकरण हो। समिति को स्थानीय समुदायों, पर्यावरणविदों और सरकारी विभागों के साथ मिलकर काम करना होगा ताकि सभी पक्षों की चिंताओं को ध्यान में रखा जाए।
कर्नाटक सरकार और वन विभाग इस प्रक्रिया को पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, ताकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन हो और राज्य के प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो सके।
