Holi 2025: हम हर साल होलिका दहन में हजारों टन लकड़ी जलाते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब प्रह्लाद को जलाने की योजना बनाई गई थी, तब क्या लकड़ी का उपयोग किया गया था? शास्त्रों में इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता।
कई मान्यताओं के अनुसार, होलिका दहन प्रतीकात्मक था और उस समय बड़े पैमाने पर लकड़ी जलाने की परंपरा नहीं थी। संभवतः उस दौर में गोबर के कंडे, सूखे पत्ते और घास-फूस का उपयोग हुआ होगा। लेकिन आज हम हर साल हजारों पेड़ काटकर लकड़ी जलाते हैं, जिससे पर्यावरण को गंभीर नुकसान होता है।
होलिका दहन: एक पर्यावरणीय समस्या
एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल 30 से 50 लाख पेड़ केवल होलिका दहन के लिए काटे जाते हैं। इसके कारण:
- वायु प्रदूषण में भारी वृद्धि होती है।
- कार्बन डाइऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से जलवायु परिवर्तन की समस्या गंभीर होती है।
- वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट होते हैं।
क्या हो सकता है समाधान?
- गोकाष्ठ (गोबर से बनी लकड़ी) का उपयोग करें – इससे पर्यावरण को नुकसान नहीं होगा और धार्मिक परंपराएं भी बनी रहेंगी।
- गोबर के कंडे, कचरे की सूखी लकड़ी और बायोडिग्रेडेबल सामग्री से होली जलाएं।
- सामूहिक होलिका दहन करें – हर गली-मोहल्ले में अलग-अलग जलाने की बजाय एक ही स्थान पर प्रतीकात्मक रूप से होली जलाएं।
- लोगों को पर्यावरण-अनुकूल होली के बारे में जागरूक करें।
होली के असली रंग: क्या पहले गुलाल उड़ाया जाता था?
प्राचीन समय में वृंदावन और बरसाने में श्रीकृष्ण और राधा फूलों की होली खेलते थे। तब लोग टेसू के फूल, हल्दी, चंदन और गुलाब की पत्तियों से बने रंगों से होली खेलते थे।
लेकिन आज बाजार में बिकने वाले 98% रंग केमिकल से बने होते हैं। इन रंगों में:
- लेड (Lead): त्वचा और आंखों को नुकसान पहुंचाता है।
- कॉपर सल्फेट: स्किन एलर्जी और जलन का कारण बनता है।
- मरकरी (Mercury): बाल झड़ने से लेकर कैंसर तक की वजह बन सकता है।
कैसे मनाएं प्राकृतिक और सुरक्षित होली?
- प्राकृतिक रंग अपनाएं – हल्दी, पालक, चुकंदर और टेसू के फूलों से बने रंग घर पर बनाएं।
- हर्बल गुलाल का उपयोग करें – ये आसानी से धुल जाते हैं और त्वचा को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते।
- सूखी होली खेलें – पानी बचाएं और धरती का ख्याल रखें।
- बच्चों को जागरूक करें – उन्हें सिखाएं कि प्राकृतिक रंगों से होली खेलना अधिक सुरक्षित और मजेदार है।
