पंजाब के संगरूर जिले के बिशनपुरा खोखर गांव के किसान मलकीत सिंह अपने खेतों में पकती गेहूं की फसल को देखकर चिंतित हैं। वे कहते हैं, “सर्दी कब आई और कब गई, पता ही नहीं चला। जनवरी में ठंड पड़ी, लेकिन फरवरी के दूसरे सप्ताह से ही दिन गर्म हो गए। फरवरी-मार्च में ज्यादा गर्मी से गेहूं की बालियों में दाना ठीक से नहीं भर पाता, दाने छोटे रह जाते हैं और झाड़ घट जाता है।”
पड़ोसी गुरप्यार सिंह भी परेशान हैं। पिछले साल उनके गांव में 25-26 क्विंटल प्रति एकड़ पैदावार हुई थी, लेकिन इस बार कम से कम 10 प्रतिशत कम होने का अनुमान है। हरियाणा के सिरसा जिले के भरोखां गांव के रमन ढाका बताते हैं कि गर्मी के डर से किसानों ने सामान्य 3 के बजाय 4 बार सिंचाई की, फिर भी खरपतवार ज्यादा हैं। वे कम से कम 400 रुपये प्रति क्विंटल बोनस की मांग कर रहे हैं।
मलकीत सिंह 2022 को याद करते हैं, जब ऐसी ही गर्मी से 5-7 मण प्रति एकड़ नुकसान हुआ था (1 मण = 40 किलो)। उस साल पंजाब-हरियाणा में 13-16 प्रतिशत पैदावार घटी थी। आईसीएआर के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र लाठर के अनुसार, समय पर बोई गई फसल में 7-8 प्रतिशत और देर से बोई में 10 प्रतिशत तक नुकसान हो सकता है। फसल 10-15 दिन पहले पक सकती है।
पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी की प्रो. पवनीत कौर किंगरा बताती हैं कि इस साल मौसम परिवर्तनशीलता ज्यादा रही। ग्लोबल वार्मिंग से वेस्टर्न डिस्ट्रबेंस नहीं बने, तापमान सामान्य से 5 डिग्री ज्यादा रहा। फरवरी में पंजाब में मात्र 0.6 मिमी बारिश हुई (98% कम), जबकि मार्च में कई इलाकों में 34 डिग्री तक पहुंचा।
हालांकि पिछले दिनों तापमान में गिरावट और हल्की बूंदाबांदी से कुछ फसलों को फायदा हुआ है। पीएयू के डॉ. हरिराम शर्मा कहते हैं कि पहले पकी फसलों का नुकसान होगा, लेकिन हरी फसलों को राहत मिल सकती है।
किसान यूनियनों की मांग है कि सरकार 500 रुपये प्रति क्विंटल बोनस दे। किसान रमन ढाका कहते हैं, “सर्दी सिकुड़ रही है, गेहूं की बाली सिकुड़ रही है और हमारी आय भी।” विशेषज्ञों ने हल्की सिंचाई और पोटेशियम नाइट्रेट छिड़काव की सलाह दी है। यह स्थिति उत्तरी भारत की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
