संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य 6 (एसडीजी-6) के तहत 2030 तक सभी के लिए सुरक्षित पानी, स्वच्छता और स्वच्छता (वाश) सुनिश्चित करने का लक्ष्य है। लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूनिसेफ की ‘स्टेट ऑफ सिस्टम्स फॉर ड्रिंकिंग वाटर, सैनिटेशन एंड हाइजीन 2025’ रिपोर्ट बताती है कि दुनिया इस लक्ष्य से काफी पीछे है। रिपोर्ट 105 देशों के आंकड़ों पर आधारित है, जो वैश्विक आबादी के 62% को कवर करती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, कई देशों में वाश नीतियां तो हैं, लेकिन अमल कमजोर है। केवल 13% से कम देशों के पास योजनाओं को लागू करने के लिए पर्याप्त वित्तीय और मानव संसाधन हैं। 64% देशों में सरकारी संस्थाओं की भूमिकाएं टकराती हैं, जिससे देरी होती है। अधिकतर देशों में पानी और शौचालय के लक्ष्य हैं, लेकिन सिर्फ 49% ने हाथ धोने के लिए राष्ट्रीय लक्ष्य तय किए हैं।
वैश्विक स्तर पर 2.1 अरब लोग सुरक्षित पेयजल, 3.4 अरब सुरक्षित स्वच्छता और 1.7 अरब बुनियादी स्वच्छता से वंचित हैं। 2019 में असुरक्षित पानी और स्वच्छता से जुड़ी बीमारियों से 14 लाख मौतें हुईं। 2024 में 60 देशों में 5.6 लाख हैजा मामले दर्ज हुए, जिसमें 6,000 मौतें हुईं। 20 देशों के आंकड़ों से पता चला कि एसडीजी-6 के लिए जरूरी वाश वित्त और उपलब्ध धन में 46% का अंतर है। औसतन 39% पानी रिसाव या चोरी से बेकार होता है।
नियमों में भी कमी है: आधे से कम देश पानी की गुणवत्ता पर सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करते हैं, और सिर्फ 20% में नियमित जांच होती है। जलवायु परिवर्तन से चुनौतियां बढ़ी हैं; 80% देश नीतियों में इसे शामिल करते हैं, लेकिन केवल 20% में प्रभावितों के लिए विशेष सहायता है।
भारत ने ग्रामीण क्षेत्रों में प्रगति दिखाई है। जल जीवन मिशन (2019) से सुरक्षित पेयजल कवरेज 2015 के 54% से 2024 में 73% पहुंचा। नवंबर 2025 तक 81% ग्रामीण घरों (15.7 करोड़) को नल से पानी मिल रहा था। सफलता के कारण: राजनीतिक इच्छाशक्ति, तालमेल, पारदर्शी डैशबोर्ड और गुणवत्ता मानक (आईएस:10500-2012, प्रति व्यक्ति 55 लीटर)।
एसडीजी-6 के लिए मजबूत प्रणाली जरूरी है: बेहतर योजना, धन, नियम, कर्मचारी, आंकड़े और जलवायु अनुकूल सेवाएं। 2030 में अब कम समय बचा है; तुरंत कार्रवाई न हुई तो करोड़ों वंचित रहेंगे। भारत का मॉडल प्रेरणा देता है।
