भारत की ऋतुएँ अब अपनी पुरानी पहचान खो चुकी हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) और डाउन टू अर्थ की नई रिपोर्ट ‘क्लाइमेट इंडिया 2025’ के अनुसार, जनवरी से 30 सितंबर 2025 तक देश में लगातार 1,227 दिनों तक हर दिन कम-से-कम एक चरम मौसम घटना दर्ज हुई। पहली बार सभी 36 राज्य-केंद्र शासित प्रदेशों में साल भर ऐसी आपदाएँ देखी गईं।
सर्दियों में लू, गर्मियों में मॉनसून जैसी बारिश और मॉनसून के बीच हीटवेव – मौसम का पारंपरिक चक्र टूट चुका है। जनवरी-फरवरी के 59 दिनों में से 57 दिन चरम घटनाओं से प्रभावित रहे; तीन दिन लू पड़ी, 51 दिन भारी बारिश-बाढ़ और 26 दिन कड़ाके की ठंड की लहर चली। मार्च-मई में 86 दिन भारी बारिश और बाढ़ दर्ज हुई, जबकि पहले यह ओलावृष्टि का मौसम होता था। मॉनसून के दौरान ही लू की घटनाएँ बढ़ीं।
2025 में फरवरी से सितंबर तक लगातार आठ महीनों में हर महीने 30 या उससे अधिक राज्य-क्षेत्र चरम मौसम की चपेट में रहे। चेन्नई में बादल फटना, राजस्थान-लेह में बाढ़, हिमालयी शहरों में रिकॉर्ड गर्मी – ये अब आम हो गए हैं। फसलों का चक्र बिगड़ रहा है; किसान जून में खरीफ बुवाई छोड़ रहे हैं। स्कूलों की गर्मी की छुट्टियाँ मार्च अंत से शुरू हो रही हैं तो अक्टूबर-नवंबर में भारी बारिश से बंद हो रही हैं। पेड़ों में फूल-फल का समय भी बदल गया है।
रिपोर्ट चेताती है कि मानव सभ्यता पिछले 12,000 साल स्थिर जलवायु में फली-फूली थी। अब ग्रीनहाउस गैसों का रिकॉर्ड स्तर और टूटता ऋतु-चक्र मानव अस्तित्व को ही चुनौती दे रहा है। अगर यही रहा तो जल्द ही “मौसम” शब्द का कोई निश्चित अर्थ नहीं बचेगा।
