environmentalstory

Home » नागालैंड विश्वविद्यालय की खोज: बिना डंक वाली मधुमक्खियां बनेंगी पॉलीहाउस खेती का भविष्य

नागालैंड विश्वविद्यालय की खोज: बिना डंक वाली मधुमक्खियां बनेंगी पॉलीहाउस खेती का भविष्य

by kishanchaubey
0 comment

नागालैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने बिना डंक वाली मधुमक्खी की दो प्रजातियों, टेट्रागोनुला इरिडिपेनिस स्मिथ और लेपिडोट्रिगोना आर्किफेरा कॉकरेल, की पहचान की है, जो पॉलीहाउस खेती में परागण के लिए अत्यंत प्रभावी हैं।

यह खोज भारतीय कृषि के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है, क्योंकि ये मधुमक्खियां सीमित स्थान में मिर्च, ककड़ी, तरबूज और कद्दू जैसी 10 फसलों का कुशलतापूर्वक परागण कर सकती हैं।

शोध के प्रमुख निष्कर्ष

नागालैंड विश्वविद्यालय के कीट विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक और प्रधान अन्वेषक अविनाश चौहान के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि बिना डंक वाली मधुमक्खियां 50-100 मीटर की सीमित दूरी में काम करती हैं और 40 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान को सहन कर सकती हैं।

ये मधुमक्खियां फूलों के प्रति विशेष आकर्षण रखती हैं और बार-बार एक ही फूल पर लौटती हैं, जिससे परागण की दक्षता बढ़ती है। साथ ही, इनका डंक न मारना किसानों के लिए सुरक्षित और सुविधाजनक है। शोध में यह भी सामने आया कि इन मधुमक्खियों के परागण से राजा मिर्च में फल लगने की दर 21% से बढ़कर 29.46% हो गई।

banner

सामान्य मिर्च में फल लगने और स्वस्थ फलों की दर में क्रमशः 7.42% और 7.92% की वृद्धि हुई। बीज के वजन में भी 60.74% की बढ़ोतरी देखी गई, जो बीज की व्यवहार्यता और अंकुरण क्षमता का संकेतक है।

पॉलीहाउस खेती और परागणकों का महत्व

भारत में कीट परागणकों की संख्या में तेजी से कमी आ रही है, जिससे खाद्य सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है। कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल फसल उपज में मधुमक्खियों का योगदान लगभग 20% है।

फसलों की आधी से ज्यादा पैदावार कीट परागणकों पर निर्भर है, जिसमें 34% तिलहन और 15% फल उत्पादन शामिल हैं। 2023-24 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, कृषि क्षेत्र भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 18.2% हिस्सा है और 42.3% आबादी की आजीविका इससे चलती है।

शहरीकरण और कृषि भूमि की कमी के कारण पॉलीहाउस खेती का महत्व बढ़ रहा है, जो कम जगह में अधिक उपज देने में सक्षम है। बिना डंक वाली मधुमक्खियां, जो पहले उष्णकटिबंधीय मानी जाती थीं, अब समशीतोष्ण और उप-समशीतोष्ण क्षेत्रों में भी पाई जाती हैं। भारत में इनकी 27 प्रजातियों में से छह नागालैंड में मौजूद हैं।

चुनौतियां और विशेषज्ञों की राय

अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड एनवायरनमेंट (ATREE) की सीनियर फेलो सौबद्रा देवी ने चेतावनी दी कि पॉलीहाउस में एक ही प्रकार के परागणकर्ता पर निर्भरता जोखिम भरी हो सकती है।

उन्होंने बेंगलुरु में किए गए एक अध्ययन का हवाला दिया, जिसमें सूखे और अत्यधिक गर्मी के दौरान बिना डंक वाली मधुमक्खियों की आबादी में कमी देखी गई। ऐसी परिस्थितियों में परागण मुख्य रूप से रॉक मधुमक्खी (एपिस डोरसाटा) द्वारा हुआ, जो पॉलीहाउस के लिए उपयुक्त नहीं है।

अतिरिक्त फायदे: शहद और प्रोपोलिस

बिना डंक वाली मधुमक्खियां न केवल परागण में उत्कृष्ट हैं, बल्कि औषधीय गुणों वाला शहद और प्रोपोलिस भी उत्पादित करती हैं। इनका शहद जीवाणुरोधी और एंटीफंगल गुणों के लिए जाना जाता है, और प्रोपोलिस की बाजार में अच्छी मांग है।

शोधकर्ताओं ने इन मधुमक्खियों के लिए विशेष ब्रूड बॉक्स विकसित किए हैं, जिनमें शहद, पराग और ब्रूड को अलग-अलग चैंबर में जमा करने की व्यवस्था है। इससे शहद संग्रहण आसान और किण्वन-मुक्त होता है।

आगे की राह

चौहान ने बताया कि शोध का अगला चरण वैश्विक मांग वाली फसलों पर केंद्रित होगा। साथ ही, शहद निकालने की बेहतर तकनीकों और इसके औषधीय गुणों के विश्लेषण पर काम किया जाएगा। मेलिसोपेलिनोलोजिकल अध्ययनों के जरिए शहद की वनस्पति और भौगोलिक उत्पत्ति भी तय की जाएगी।

यह खोज न केवल पॉलीहाउस खेती को बढ़ावा देगी, बल्कि मधुमक्खी पालकों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत भी बन सकती है, जिससे भारत की खाद्य सुरक्षा और कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

You may also like